Thursday, June 9, 2011

और 'अना' अना न रही







क्या बताऊँ मैं 'मीत' कितना उसे चाहा था
सिवा हयात से अपने, उसे सराहा था


और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
एक थी रूह मगर हम जुदा हुए क्योंकर ?
या कहीं खो के अब तू और मेरी रूह में है ?


न जाने कौन से वहम-ओ-गुमाँ थे दिल पे मुहीत
कि जब कि दोनों जानते थे हक़ीक़त क्या है
कि जब कि दोनों को यक़ीन था तह-ए-दिल से
कि जिस्म दो हैं मगर एक जान है अपनी


न जाने कौन सी अना का फिर तक़ाज़ा था
कि हम भी हम न रहे, और 'अना' अना न रही !!




27 comments:

निर्मला कपिला said...

हर एक पँक्ति दिल को छूती हुयी, मगर अफसोस कि सुना नही जा सकादेखें क्या प्राबलम है। शुभकामनायें।

नीरज गोस्वामी said...

बहुत खूबसूरत नज़्म है...पता नहीं अना रिश्तों में क्यूँ आ जाती है...
तलत का गीत मेरा पसंदीदा है...सुनवाने का शुक्रिया.

नीरज

मनोज कुमार said...

सुंदर प्रस्तुति।

ehsas said...

बेहद उम्दा और खुबसुरत।

pallavi trivedi said...

और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
एक थी रूह मगर हम जुदा हुए क्योंकर ?
या कहीं खो के अब तू और मेरी रूह में है ?

वाह...खूबसूरत पंक्तियाँ!

अजय कुमार said...

achchhee rachanaa , badhaayi

वन्दना said...

बेहतरीन नज़्म दिल को छू गयी।

दिलीप कवठेकर said...

Meet ji, After a long time, I came here for Dilee Sukoon, and I am floored!!!
Nor able to hear your Charismatic Voice in player.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...

ana said...

bahut sundar

PRIYANKA RATHORE said...

ana...ana na rahi....bahut khoob...

parul singh said...

और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
wah kitna najuk par gahra khayal hai
lajawab

parul singh said...

और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
bahut hi najuk lafzo main gahri baat
dil main uttar gayi jesse apni hi soch ho..

मीनाक्षी said...

ब्लॉग़जगत में कुछ ऐसे घर हैं जहाँ आकर सुकून मिलता है और बस यूँ ही उस ख़ामोशी को महसूस करके ख़ामोश ही लौट जाना अच्छा लगता है..आज बस कह देने को जी चाहा ...

anu said...

न जाने कौन से वहम-ओ-गुमाँ थे दिल पे मुहीत
कि जब कि दोनों जानते थे हक़ीक़त क्या है
कि जब कि दोनों को यक़ीन था तह-ए-दिल से
कि जिस्म दो हैं मगर एक जान है अपनी

वाह बहुत खूब ....जिस्म जरुर जुदा है ...आत्मा का मिलन ...बहुत खूब

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut sunder meet ji.

अनुपमा त्रिपाठी... said...

bahut sunder nazm aur dilkash geet ...
abhar dono ke liye..

अनुपमा त्रिपाठी... said...

आपकी किसी पोस्ट की हलचल है ६-८-११ शनिवार को नयी-पुरानी हलचल पर ..कृपया अवश्य पधारें..!!

निवेदिता said...

सुंदर प्रस्तुति...........

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया।

सादर

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

वीना said...

वाह...बहुत बढ़िया...

Dorothy said...

और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी

बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Rahgeer said...

ज़िन्दगी भर का लेन देन ‘अना’
और हिजाबो-किताब कुछ भी नहीं

Puja Upadhyay said...

आपकी गजलें अद्भुत होती हैं मीत जी...जब भी इस पन्ने पर आती हूँ कोई जादू होता देखती हूँ।