
क्या बताऊँ मैं 'मीत' कितना उसे चाहा था
सिवा हयात से अपने, उसे सराहा था
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
एक थी रूह मगर हम जुदा हुए क्योंकर ?
या कहीं खो के अब तू और मेरी रूह में है ?
न जाने कौन से वहम-ओ-गुमाँ थे दिल पे मुहीत
कि जब कि दोनों जानते थे हक़ीक़त क्या है
कि जब कि दोनों को यक़ीन था तह-ए-दिल से
कि जिस्म दो हैं मगर एक जान है अपनी
न जाने कौन सी अना का फिर तक़ाज़ा था
कि हम भी हम न रहे, और 'अना' अना न रही !!




27 comments:
हर एक पँक्ति दिल को छूती हुयी, मगर अफसोस कि सुना नही जा सकादेखें क्या प्राबलम है। शुभकामनायें।
बहुत खूबसूरत नज़्म है...पता नहीं अना रिश्तों में क्यूँ आ जाती है...
तलत का गीत मेरा पसंदीदा है...सुनवाने का शुक्रिया.
नीरज
सुंदर प्रस्तुति।
बेहद उम्दा और खुबसुरत।
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
एक थी रूह मगर हम जुदा हुए क्योंकर ?
या कहीं खो के अब तू और मेरी रूह में है ?
वाह...खूबसूरत पंक्तियाँ!
achchhee rachanaa , badhaayi
बेहतरीन नज़्म दिल को छू गयी।
Meet ji, After a long time, I came here for Dilee Sukoon, and I am floored!!!
Nor able to hear your Charismatic Voice in player.
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
बेहतर...
bahut sundar
ana...ana na rahi....bahut khoob...
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
wah kitna najuk par gahra khayal hai
lajawab
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
bahut hi najuk lafzo main gahri baat
dil main uttar gayi jesse apni hi soch ho..
ब्लॉग़जगत में कुछ ऐसे घर हैं जहाँ आकर सुकून मिलता है और बस यूँ ही उस ख़ामोशी को महसूस करके ख़ामोश ही लौट जाना अच्छा लगता है..आज बस कह देने को जी चाहा ...
न जाने कौन से वहम-ओ-गुमाँ थे दिल पे मुहीत
कि जब कि दोनों जानते थे हक़ीक़त क्या है
कि जब कि दोनों को यक़ीन था तह-ए-दिल से
कि जिस्म दो हैं मगर एक जान है अपनी
वाह बहुत खूब ....जिस्म जरुर जुदा है ...आत्मा का मिलन ...बहुत खूब
Bahut sunder meet ji.
bahut sunder nazm aur dilkash geet ...
abhar dono ke liye..
आपकी किसी पोस्ट की हलचल है ६-८-११ शनिवार को नयी-पुरानी हलचल पर ..कृपया अवश्य पधारें..!!
सुंदर प्रस्तुति...........
बहुत ही बढ़िया।
सादर
बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
वाह...बहुत बढ़िया...
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थी
बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
ज़िन्दगी भर का लेन देन ‘अना’
और हिजाबो-किताब कुछ भी नहीं
आपकी गजलें अद्भुत होती हैं मीत जी...जब भी इस पन्ने पर आती हूँ कोई जादू होता देखती हूँ।
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