Monday, May 23, 2011

"मजाज़" : ..... तुम भी सुन लो दुश्मन-ए-जाँ !!









ग़म-ए-दौराँ में गुज़री, जिस क़दर गुज़री, जहाँ गुज़री
और उस पर लुत्फ़ ये है ज़िन्दगी को मुख़्तसर जाना !



पिछले कुछ दिनों से अपने सब से ज्यादा पसंदीदा तीन शायरों में से एक - "मजाज़" को एक बार फिर पढ़ रहा था.


जी में आया कि इस अज़ीम शायर के नाम "किस से कहें ?" पर कमस्कम एक पोस्ट तो लाज़मी है .....


तो असरारुलहक़ "मजाज़" के नाम अगली पोस्ट की तैयारी है .... फ़िलहाल आज पढ़ें उन के ये दो क़त'आत .....


तुझे ढूंढता हूँ तेरी जुस्तजू है
मज़ा है कि ख़ुद गुम हुआ चाहता हूँ
ये मौजों की बेताबियाँ कौन देखे
मैं साहिल से अब लौटना चाहता हूँ


बारहा ऐसा हुआ है याद तक दिल में न थी
बारहा मस्ती में लब पर उस का नाम आ ही गया
खुल गई थी साफ़ गर्दूं की हक़ीक़त ऐ "मजाज़"
खैरियत गुज़री कि शाही ज़ेर-ए-दाम आ ही गया


और सुनें ये ग़ज़ल ...... जगजीत सिंह की आवाज़ में .......... तुम भी सुन लो दुश्मन-ए-जाँ !!



9 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जगजीत सिंह की आवाज में और भी मधुर।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वाह! बहुत सुन्दर!

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post.
http://islam.amankapaigham.com/2011/05/blog-post.html

Anonymous said...

http://aduanapt.blogspot.com/

prerna argal said...

बारहा ऐसा हुआ है याद तक दिल में न थी
बारहा मस्ती में लब पर उस का नाम आ ही गया.BAHUT BADIYAA LINES.bahut achche sher.badhaai aapko.jagjit singhji ki awaaj main gajal sooni bahut ach chi lagi.thanks.



please visit my blog and leave the comments also.

रवि कुमार, रावतभाटा said...

ये मौजों की बेताबियाँ कौन देखे
मैं साहिल से अब लौटना चाहता हूँ...

' मिसिर' said...

आपका ब्लाग बहुत अच्छा लगा ! बधाई !

अभय तिवारी said...

बढ़िया है..
बस अपने प्रिय शाएर का नाम इसरारुल हक़ से असरारुल हक़ कर लें..

अमिताभ मीत said...

जी मालिक ! आप बेशक़ सही फ़रमाते हैं .....

आप कहते हैं तो मेरे प्रिय शायर (मेरे प्रिय शायरों में से एक) का नाम ज़रूर "असरारुलहक़" ही है ..... "इसरारउलहक़" नहीं ..... सर आप का आदेश सर आखों पर !!

NET पे मैं ने आज पहली बार देखने की कोशिश की .... आप के आदेश के बाद ..... सो ज़्यादातर "असरारुलहक़" ही मिला .... लाज़िम है ...... ( और ग़लती दुरुस्त कर दी गई है ) ......क्यों कि मुझे NET से ज़यादा आज तक ... किताबों से ही मतलब रहा ...........

हालांकि मेरी छोटी सी समझ में बचपन से आज तक ...... दो लोगों ने बहुत असर छोड़ा है ..... "प्रकाश पंडित" ... और ... "अयोध्याप्रसाद गोलायीय" ..... (और मेरी समझ obviously उतनी नहीं है ....) ... सो मैं ने अक्सर इन लोगों की बातों पर भरोसा किया है .......

Obviously ग़ालिब, मीर, ज़ौक, जोश, नासिख़, दाग़, सीमाब, फैज़, साहिर, मजाज़, ......... वगैरह ..... वगैरह ..... (आप भी जानते हैं .... ) ...मेरी तो कोई औक़ात ही नहीं .... के बाद ....

अब मुझे माफ़ ही रखिये मालिक ...........

But in any case ...... इन लोगों को भूल भी जाएँ .... तो "इसरारउलहक़"और "असरारुलहक़" में फ़र्क़ ही कितना है ...... "ज़ुबान की लिहाज़ से भी ??" "इसरार" ... "असरार" ..... वैसे मेरी समझ कोई ख़ास नहीं !!