
आज भी हर सुबह
खिड़की से आती रौशनी से
तुम्हारा ही चेहरा बनता है - मेरे कमरे की दीवार पे !
आज भी मेरी आँखों में चमकता है वही,
या शायद ....
मेरी आँखें चमकती हैं - उसी नूर से
एक पतंगा -
उस लौ के गिर्द
जो है ही नहीं ...
फिर भी -
तुम कोई तो हो !
कोई - जिस के बिना जीना
ज़िन्दगी जैसा तो नहीं है !!
मीत सब झूठे पड़ गए ..........




16 comments:
बेहतरीन, खिड़की से छनकर आती धूप में किसी की आकृति दिख जाना प्रेम की परिभाषाओं से परे है।
दिल को छुं गई आपकी यह रचना !
एक पतंगा -
उस लौ के गिर्द
जो है ही नहीं ...
बस यह आभास है ..जीवन का वास्तविकता कुछ और है ..बहुत गहरे भाव
मेरी आँखें चमकती हैं - उसी नूर से ........ यही तो प्रेम है....
आज भी हर सुबह
खिड़की से आती रौशनी से
तुम्हारा ही चेहरा बनता है - मेरे कमरे की दीवार पे !
...बहुत सुन्दर संवेदनशील रचना..बहुत भावपूर्ण..
बहुत भावपूर्ण रचना!
If it is absurd then I must tell u that the absurd is the essential concept and the first truth. :)
Said Albert Camus
P.S.- Now I can hear ur voice even when I m reading ur poems.
हम तो चित्र में ही अटके रहे Myth of Sisyphus?
जी हाँ ...The Myth of Sisyphus.
The beauty of Kafkaesque and the Great Kafka.
कोई तो है जो है ही नहीं. मैंने काफ्का को नहीं पढ़ा पर वो गीत याद आ गया, 'कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं, ऐसे भी बातें होती हैं.' कैफ़ी ने लिखा है शायद, ना?
ओह हाँ, ये गीत मैंने पहली बार सुना. किस फिल्म का है?
बहुत खुबसूरत अहसास और उनको सुन्दर शब्दों से सजाया . बधाई
बहुत खूबसूरत रचना ....और गीत तो बहुत अच्छा लगा ...आभार
first time aapke blog per aai hoon.aapki rachna padhi achchi lagi.ek patanga lo ke gird jo hai hi nahi.....bahut achchi panktiyan lagi.you also welcome to visit my blog.apeksha rakhti hoon.
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