Sunday, February 13, 2011

फैज़ अहमद "फैज़" - The Magician : १





अपनी तकमील कर रहा हूँ मैं
वर्ना तुझ से तो मुझे प्यार नहीं




उर्दू शायरी की बात हो तो ग़ालिब, मीर, दाग़, मोमिन, सौदा...... और ऐसे ही कई अज़ीम शायरों के बाद ... . हमारे दौर के शायरों में मुझे सब से ज्यादा मुत'अस्सिर किया है ..... मजाज़, फैज़, और साहिर ने.


आज, १३ फ़रवरी, २०११, फैज़ अहमद "फैज़" की सालगिरह का दिन है.


सौ साल पहले, १३ फ़रवरी, १९११ को सिआलकोट, पंजाब में जन्म हुआ था इस जादूगर का.


शैख़ साहब से रस्म-ओ-राह न की
शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की

तुझ को देखा तो सेर-चश्म हुए
तुझ को चाहा तो और चाह न की

कौन क़ातिल बचा है शहर में "फैज़"
जिस से यारों ने रस्म-ओ-राह न की



दोस्तों "फैज़" की शायरी की बात हो ... तो मैं तो उस का इस क़दर दीवाना हूँ, कि ये सिलसिला थमेगा ही नहीं ....


"फैज़" की शायरी इस ब्लॉग जगत में यहाँ वहाँ बिखरी हुई है .... आज मैं उन की शायरी को उन्हीं की ... और कुछ और आवाज़ों में पेश करता हूँ .... सुनिए ... और खोते जाइए ................



कुछ नज़्में .... खुद "फैज़" की आवाज़ में ....




कब ठहरेगा दर्द-ए-दिल ... इक़बाल बानो




नज़्म .... आवाज़ ज़ेहरा निगाह




तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार ...... अमानत अली खां





इतनी चीज़ें हैं सुनने - सुनवाने को ... कि एक पोस्ट बहुत ही नाकाफ़ी है .... सो आगे भी समय समय पर "फैज़" का जादू इस ब्लॉग पर तारी होता रहेगा ..... ख़याल रखियेगा !!



तकमील = पूर्णता
सेर-चश्म हुए = आँखों की सारी भूख मिट गई

16 comments:

रश्मि प्रभा... said...

waakai saari bhukh mit gai

pratibha said...

Shukriya!

डॉ. मनोज मिश्र said...

लाजवाब पोस्ट,आभार.

Udan Tashtari said...

बहुत आभार मौके पर इस पोस्ट का.

Kunwar Kusumesh said...

फैज़ साहब के जन्म दिन की १०० वीं वर्षगाँठ पर ये पोस्ट सुन्दर, सामयिक और प्यारी लगी.

Kajal Kumar said...

फ़ैज़ साहब की बात कुछ और है.

रवि कुमार said...

और भी ग़म है ज़माने में मुहब्बत के सिवा...
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा...

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग.....

Kailash C Sharma said...

वाह! फैज़ साहब की शायरी का कोई ज़वाब नहीं..

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जवाब नहीं इस पोस्ट का। हम तो देखते ही कायल हो चले।

swaarth said...

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, जबां अब तक तेरी है...

धन्यवाद अमिताभ जी,
बहुत समय बाद ज़ेहरा साहिबा की आवाज़ में नज़्म आपके ब्लॉग पर सुनी|

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन, आगे भी सुनते रहेंगे।

AVADH said...

वाह, अमिताभ जी,
मज़ा आ गया. क्या चुनिन्दा पेशकश है.
मैं कल इसे नहीं देख पाया था.
अभी इस पर नज़र पड़ी.
आपने बहुत सही कहा है-फैज़,मजाज़,साहिर का क्या कहना.
वैसे फ़िराक़,कैफ़ी,जाँ निसार अख्तर की शायरी की भी अलग बात है.
बेहद शुक्रिया.
अवध लाल

ZEAL said...

Beautiful ghazals ..thanks.

mukti said...

आज पढ़ी इत्मीनान से ये पोस्ट. और ग़ज़लें और नज्में भी सुनीं. फैज़ तो फैज़ हैं आखिर...

mahendra verma said...

फैज साहब की क़लम का जादू सिर चढ़ कर बोलता है।
शायरी और गीत-संगीत का गुलदस्ता अच्छा लगा।

फणि राज मणि चन्दन said...

I came here looking for a Ghazal of Faiz, and now I cannot leave :-)