Saturday, February 5, 2011

'फ़िराक़' गोरखपुरी - १









हुस्न को इक हुस्न ही समझे नहीं और ऐ 'फ़िराक़'
मेहरबाँ.. नामेहरबाँ.. क्या क्या समझ बैठे थे हम



बातों के रसिया रघुपति सहाय 'फ़िराक़' गोरखपुर के रहने वाले थे. वहीं २८ अगस्त, १८९६ को उन का जन्म हुआ और वहीं उन्हों ने प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की. उन के पिता मुंशी गोरखप्रसाद 'इबरत' उस समय के प्रासिद्ध वकील और शायर थे. सो शायरी 'फ़िराक़' को घुट्टी में मिली.


लेकिन उन की शायरी में निखार तब आया, जब उच्च शिक्षा के लिए वो इलाहाबाद गए. इलाहाबाद में 'फ़िराक़' प्रोफ़ेसर 'नासरी' जैसे साहित्यिक के संपर्क में आये. प्रोफ़ेसर 'नासरी' ने न केवल उन की ग़ज़लों में संशोधन किये, बल्कि उन्हें उर्दू शायरी के नियमों से भी वाकिफ़ कराया.


उन्हों ने म्योर सेन्ट्रल कॉलेज, इलाहबाद से बी ए पास किया ही था कि सरकार ने उन्हें डिप्टी कलक्टरी के लिए चुन लिया. लेकिन डिप्टी कलक्टर बनने की जगह उन्हों ने कॉंग्रेस आन्दोलन में भाग लेना पसंद किया. और जो होना था वही हुआ ..... उन्हें जेल भेज दिया गया.


उस के बाद कई सालों तक, जब जवाहरलाल नेहरु कॉंग्रेस के जेनरल सेक्रेटरी थे, तो 'फ़िराक़' कॉंग्रेस के अंडर सेक्रेटरी रहे. जेलों की तो वो शोभा थे .... वहां न सिर्फ़ उन के शेर-ओ-शायरी का सिलसिला जारी रहा, बल्कि जेलख़ाना उन के लिए शेर-ओ-शायरी की पाठशाला बन गया. उन की मुलाक़ात सिद्धहस्त शायरों से हुई, और बड़े बड़े साहित्य प्रेमियों का भी सानिध्य मिला. मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना 'हसरत' मोहानी और मौलाना अबुल कलाम 'आज़ाद' जैसे उस्तादों की सोहबत ने सोने पर सुहागे का काम किया ..... और उन्हों ने ख़ुद ही कहा :


अहले-ज़िन्दां की ये मजलिस है सबूत इस का 'फ़िराक़'
कि बिखर कर भी ये शीराज़ं परीशां न हुआ


अहले-ज़िन्दां = जेल में रहनेवाले
शीराज़ं = किताब को बाँधनेवाली सिलाई
परीशां न हुआ = बिखरा नहीं



१९२७ में 'फ़िराक़' जेल से रिहा हुए और क्रिश्चियन कॉलेज, लखनऊ, और फिर सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर में उर्दू पढ़ाने के लिए बुला लिए गए. इसी बीच उन्हों ने एम ए पास कर लिया और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर नियुक्त किये गए. यहीं से उन्हों ने सेवानिवृत्ति प्राप्त की.


'फ़िराक़' ने अनगिनत कवितायें, ग़ज़लें, रुबाइयां, क़ते वगैरह लिखे. समालोचक भी वे उच्च कोटि के थे लेकिन याद उन्हें हमेशा उनकी शायरी के लिए किया जाएगा.


एक लम्बी बीमारी के बाद, ३ मार्च, १९८२ को इलाहाबाद में 'फ़िराक़' दिवंगत हुए.


'फ़िराक़' की शायरी पर एक नज़र अगले किसी पोस्ट में .... फ़िलहाल उनकी शायरी से चुने मेरी पसंद के कुछ शेर :


क़ालिब में रूह फूँक दी या ज़हर भर दिया
मैं मर गया हयात की तासीर देख कर

हैराँ हुए न थे जो तसव्वुर में भी कभी
तस्वीर हो गए तेरी तस्वीर देख कर

ये भी हुआ है अपने तसव्वुर में हो के मह्व
मैं रह गया हूँ आप की तस्वीर देख कर

सब मरहले हयात के तय कर के अब 'फ़िराक़'
बैठा हुआ हूँ मौत में ताख़ीर देख कर



क़ालिब = शरीर
मह्व = मग्न
ताख़ीर = विलम्ब



ये माना, ज़िन्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वाइज़ मगर है
ज़रुरत आदमी को आदमी की

मिला हूँ मुस्कुरा कर उस से हर बार
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी सी

मुहब्बत में कहें क्या हाल दिल का
ख़ुशी ही काम आती है, न ग़म ही

भरी महफ़िल में हर इक से बचा कर
तेरी आँखों ने मुझ से बात कर ली




कुछ इशारे थे जिन्हें दुनियाँ समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम

रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए
वाह री ग़फ़लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम

भूल बैठी वो निगाह-ए-नाज़ अहद-ए-दोस्ती
उस को भी अपनी तबीयत का समझ बैठे थे हम



निगाह-ए-आशना = परिचित नज़र
निगाह-ए-नाज़ = नाजों भरी नज़र
अहद-ए-दोस्ती = दोस्ती का वादा



फ़िराक़ की शायरी के कुछ और मोती उन की अगले पोस्ट में ....


फ़िलहाल 'फ़िराक़' की दो ग़ज़लें सुनें ......


"अब अक्सर चुप चुप से रहे हैं ......." जगजीत सिंह की आवाज़ में ......





और


"शामे-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो ......."
( ये आवाज़ किस की है ? बताइये !!!! )





'फ़िराक़' गोरखपुरी की दो और बेमिसाल ग़ज़लें अगली बार !!

23 comments:

शिवम् मिश्रा said...

अब की बार आप काफी लम्बे गायब रहे ... खैर देर आमद दुरुस्त आमद !
फिराक साहब की इन नज्मो के लिए बहुत बहुत आभार आपका !

श्रद्धा जैन said...

wah kya khoobsurat gazlen hai.. jagjeet singh ji aawaz dil ko sakun deti hai..

pratibha said...

जब बात फिराक साब की हो तो कुछ न कहा जाये. बस उन्हें पढ़ा जाए, सुना जाए, गुना जाए...

"अर्श" said...

आदाब हुज़ूर,
वाह , अभी तो दिन पहले ही तो आपसे शिकायत की थी मैंने की बहुत दिन हुए ब्लॉग पर आपके नई को आये ! खैर बेहद खुबसूरत तोहफा दिया आपने ! सुबह सुबह ही सुन चूका था मगर आपके फ़ोन के बाद फिर से आगया ! रविवार का दिन खुशनुमा हो गया शुक्रिया इसके लिए ! हाँ दूसरे गायक की आवाज़ नहीं पहचान पा रहा ! पर आवाज़ बहुत मखमली है !


अर्श

Kailash C Sharma said...

फ़िराक साहब के जीवन और शायरी से परिचय कराने के लिए आभार..

प्रवीण पाण्डेय said...

जितना भी समझ सका, बहुत अच्छा लगा।

डॉ. मनोज मिश्र said...

मस्त पोस्ट,अच्छी जानकारी,आनंद आ गया.

रवि कुमार said...

बेहतर प्रस्तुति...
रघुपति सहाय का अन्य लेखन भी कमाल का है...पर आपने सही कहा कि आम पहचान शायरी से ही है...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

firaaq saab ko ek baar fir se janna samjhna padhna accha laga .... :) kuch sher aise hain har baar naye jaaviye ke sath khulte hain...

saadar... :)

ZEAL said...

दोनों गजलें , एक से बढ़कर एक हैं।

रश्मि प्रभा... said...

aapne to sama baandh diya ...

'साहिल' said...

बहुत ही खूबसूरत ब्लोग्स हैं आपके, यहाँ आकर लगा जैसे कोई (ग़ज़ल का) खज़ाना हाथ लग गया.
मेरे ख्याल से दूसरी ग़ज़ल 'विनोद सहगल' जी ने गाई है. ये cassette मेरे पास थी, 'कहकशां' टी.वी सीरियल की है. इसकी सारी ग़ज़लों की धुनें बेहतरीन हैं.

जयकृष्ण राय तुषार said...

DHANYVAD BHAI AMITABH MEET JI.

Dr. Amar Jyoti said...

हार्दिक आभार!

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

फ़िराक साहब की ग़ज़लों के शेर दिल में उतर गए !
आपका बहुत बहुत आभार !

नीरज गोस्वामी said...

फिराक साहब की शायरी की बात ही क्या है...ऐसा बुलंद कद वाला शायर दूसरा नहीं हुआ...उनकी शायरी पढना एक अनुभव है...तभी तो उन्होंने कहा है के:-

आने वाली नस्लें तुम पर नाज़ करेंगी हम असरो !
तुम ने फ़िराक से बातें की हैं, तुम ने फ़िराक को देखा है



नीरज

स्वप्नदर्शी said...

vah!
shukriya!

vijaymaudgill said...

bhai sahib dhayna bhaag hamare jo aap mujhe mil gaye. sach batau to pata nahi kab se dhoond raha hu apko. kyuki jo khazana apke paas hai aur kisi k paas nahi. kareeb ek saal pehle main apke blog par sara din sunta hi raha tha bas follow karna bhool gaya tha aur mujhe apke naam ka sirf meet yaad reh gaya tha. shukr hai aapke dobara didaar huye. thnx

Dr (Miss) Sharad Singh said...

फ़िराक साहब के जीवन और शायरी की बेहतरीन प्रस्तुति....., बधाई स्वीकारें !

Neeraj Rohilla said...

मीत साहब,
लिंक देने के लिये शुक्रिया वरना ये पोस्ट व्यस्तता के चलते नजर से फ़िसल गयी थी।
दूसरी गजल में आवाज विनोद सहगल की है। रेडियोवाणी वाले युनुस से कभी उनके बारे में बात कीजियेगा। युनुस विनोद सहगल जी से मिलते रहते हैं।

फ़िराक की जो पहली गजल आपने पेश की है, जब भी सुनो दिल में छेद कर देती है।

"पहले फ़िराक को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं"

mukti said...

मैं फिराक जी के बारे में थोड़ा-बहुत सुना था. आज पहली बार इतने विस्तार से जानकारी मिली.आभार !
और फिर जो ग़ज़लें आपने सुनवाई हैं उनका शुक्रिया.

Devi Nangrani said...

bahut hi Nayab pasanddida ghazals ka sankalan sunne ko milta hai is manch par aakar
daad ke saath

Devi Nangrani said...

Bepanah rahton ka baayaz ban gaya hai yeh sangeetmay vatavaran