Monday, September 20, 2010

उन आँखों के नाम ....

कौन कहता है ..... यादों के सहारे ज़िन्दगी बसर नहीं होती ?

होती है .... यक़ीनन होती है .....और इस तेवर से होती है !!

वो ख़ूबसूरत-सा एहसास, ज़िन्दगी करने को काफ़ी नहीं होता क्या ?



एक मुद्दत हुई डूबा था इन्हीं आँखों में 'मीत'
डूब कर फिर न वो उबरा, न उबरना चाहा


तेरी आँखों की कशिश, एक इशारा उन का
ज़िन्दगी भर के लिए अब है सहारा जिन का
तेरी आँखों में मुहब्बत का वो दरिया देखा
तेरी आँखों से सदाक़त का जो पैग़ाम मिला
थम गई उम्र-ए-रवां आ गया दिल को वो सुकूँ
गोया इस दिल को यही चाह थी हमेशा से
और मैं अपने ही तक़ाज़ों से बेगाना था

इस ज़माने से, ज़माने के तक़ाज़ों से जुदा
ज़िन्दगी चल रही थी, मुझ को ये गुमाँ भी न था
होगा ये हादिसा, इस का कोई इम्काँ भी न था
एक ख़ामोश चाँद-रात दबे पाँव कहीं
बेसदा और बेआवाज़ यूँ तेरा आना
और ख़ामोश मेरी ज़िन्दगी पे छा जाना

सानिहा ऐसा एक बार ही गुज़रता है दोस्त
एक ही बार कोई इस तरह किसी के लिए
हर नफ़स जीता है और हर नफ़स यूँ मरता है दोस्त
इक ज़रुरत, कि उसे जिस की ख़बर तक भी न हो
पूरी हो गर, तो बशर कुछ भी कर गुज़रता है दोस्त !






सदाक़त = सच्चाई
उम्र-ए-रवां = चलती हुई उम्र / ज़िन्दगी
तक़ाज़ा = ज़रूरत
इम्काँ = संभावना
सानिहा = हादिसा
नफ़स = साँस
बशर = इंसान

19 comments:

निर्मला कपिला said...

एक संवेदनशील और वफादार इन्सान के दिल से निकली खूबसूरत रचक़्ना के लिये क्या कहूँ? बधाई या शुभकामनायें। जिस्म से किसी का होना या न होना मायने नही रखता मायने रखता है वो सुख्द एहसास जिसे याद करके भी मन को सकून मिले। बहुत खूब ।

रश्मि प्रभा... said...

teri aankhon ki kashish aur ishaara unka
kuch tum sunte rahe ishare unke kuch kahte rahe

दिगम्बर नासवा said...

उम्दा नज़्म उन आँखों के नाम .....

सुशीला पुरी said...

' एक मुद्दत हुई डूबा था इन आखों मे 'मीत',
डूब कर फिर न वो उबरा , न उबरना चाहा !!!

वाह क्या बात है !!!

गिरीश बिल्लोरे said...

बेहद दार्शनिक एंगल से देखा आपने

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती पंक्तियाँ।

अनिल कान्त : said...

हम क्या कहें....

mukti said...

मैं मौन हूँ... दो-तीन बार इन पंक्तियों को पढ़ा और जाने क्यों ? कैफी आज़मी याद आ गए.

नीरज गोस्वामी said...

लाजवाब नज़्म कह डाली है आपने मीत साहब...मेरी दिली दाद कबूल करें...

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रख्खा क्या है...


नीरज

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर........दिल को छूनेवाली बहुत मार्मिक रचना...आभार...
http://sharmakailashc.blogspot.com/

"अर्श" said...

मैं तो लिंक मिलते ही अपना हेड फोन लेके आया था आपकी पुरकशिश आवाज़ भी सुनने के लिए .. मगर निराशा ही हाथ लगी , खैर नज़्म बहुत खुबसूरत है बिलकुल आपके अंदाज़ में ... शुक्रिया इस खुबसूरत नज़्म को पढवाने के लिए ...
डूब कर फिर न वो उबरा ,न उबरना चाहा ...

ढेरो बधाई कुबूल फरमाएं
अर्श

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत ही संवेदनशील और प्रभावशाली रचना......

इमरान अंसारी said...

खुबसूरत रचना .........जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया.......... ........आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा .............आगे भी ऐसे ही बढ़िया पड़ने को मिलेगा इस उम्मीद में आपको फॉलो कर रहा हूँ | ये पंक्तियाँ बहुत पसंद आयीं -

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अनामिका की सदायें ...... said...

samvedanshaali rachna.

शारदा अरोरा said...

नज्म सुन्दर है , कौन कहता है यादों के सहारे जिन्दगी बसर नहीं होती ...मैं तो समझती हूँ कि अगर आगे चलने की डगर न नजर आए तो जिन्दगी दौड़ती तो नहीं ही है ..रुकी रुकी सी और डील डूबता हुआ सा महसूस होता है ।

VIJAY KUMAR VERMA said...

एक मुद्दत हुई डूबा था इन आखों मे 'मीत',
डूब कर फिर न वो उबरा , न उबरना चाहा !!!
बहुत ही खूबसूरत पक्ति....उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई

sandhyagupta said...

एक मुद्दत हुई डूबा था इन आखों मे 'मीत',
डूब कर फिर न वो उबरा , न उबरना चाहा !!!

आप ही की कलम हो सकती है.बहुत अच्छे.

रवि कुमार, रावतभाटा said...

वाह क्या बात है...

योगेन्द्र मौदगिल said...

wahwa....kya baat hai...