
बस तीन शेर "मीर" के ...... और एक पसंद का गीत "तलत" की आवाज़ में ......
"हम ने भी नज़्र की है कि फिरिए चमन के गिर्द
यारब ! चमन के छूटने तक बाल-ओ-पर रहें !!"
"वजह-ए-बेगानगी नहीं मालूम
तुम जहां के हो, वां के हम भी हैं"
"रहा था देख उधर 'मीर' चलते
अजब इक नाउमीदी थी नज़र में"
तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी .... "तलत"









12 comments:
उफ्फ, क्या शेर और क्या गीत...छा गये!
kamaal ki aawaz aur uspar khubsurati se gaya gayaa ... is geet ko sunwaane ke liye dil se shukriyaa...
arsh
LAJAWAAB SHER AUR TALAT KI AAWAAZ.....SAMA BANDH GAYA .....
अमिताभ भाई, आपकी पसन्द के हम पहले से ही कायल है....वाकई आप छा गये
गीत बहुत ही बढिया और आपका लिखा.... पुराने गीतों में एक अलग-सी बात
बेहतरीन...तलत मुझे बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत पसंद है...शुक्रिया ...और मीर के शेर...सुभान अल्लाह..
नीरज
वजहे बेगानगी नही मालूम
जहां के तुम हो हम भी वहीं के है ।
बहुत सुंदर और गीत के तो क्या कहने । आपकी पसंद
बहुत अच्छी लगी ।
"aaraam wo kyaa degi,
jo tarhpaa na sakegii....."
huzoor....
aapne bahut bahut barhaa karam
kiyaa jo aisaa nayaab aur km-suna-jane-wala geet sunvaa kr dili sukoon bakhsh diyaa hai...
s h u k r i y a a !!
वाह साहब इधर मीर और उधर तलत ... जान लेंगे क्या हमारी?
Bine kahe lafaaz bol uthe
bahut khoob!!!
Devi Nangrani
जहाँ तक मेरा ख्याल है ये ग़ज़ल मीर kee nahi बल्कि
फैयाज़ हाश्मी की है ,पता लगाए...
तलत महमूदजी ने अपनी मखमली आवाज़ मे
बहूत सुंदर गाया है ,कोई शक नही
जहाँ तक मेरा ख्याल है ये ग़ज़ल मीर किन्ही बल्कि
फैयाज़ हाश्मी की है ,पता लगाए...
तलत महमूदजी ने अपनी मखमली आवाज़ मे
बहूत सुंदर गाया है ,कोई शक नही
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