फैज़ अहमद "फैज़" की नज्मों की पहली किताब "नक्श-ए-फरियादी" की भूमिका में ख़ुद "फैज़" ने ये लिखा. अब देखिये "ग़ालिब" ने अपने शायरी से किनारा (एक अर्से के लिए) करने पर क्या कहा था :
"जब से मेरे सीने का नासूर बंद हो गया है, मैं ने शेर कहना छोड़ दिया है."
ख़ैर साहब, कल के मेरे post "हम देखेंगे ....." के बाद मुझे लगा कि कुछ दिनों के लिए माहौल को "फैज़नुमा" बनाने में कोई ख़ास बुराई नहीं .... और शायद कुछ लोग भी उसी तरह मस्त हो जाएँ "फैज़" की शायरी सुन और पढ़ कर, जैसा मैं एक मुद्दत से होता रहा हूँ. किसी को कोई ऐतराज़ तो नहीं ?
आज एक बार फिर "फैज़" की एक नज्म "दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्जां हैं ....". आवाज़ आज फिर एक बार इक़बाल बानो की ........
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्जां हैं
तेरी आवाज़ के साये तेरे होंठों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले
खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन और गुलाब
उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तेरी साँस की आँच
अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफ़क़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ
यूँ गुमाँ होता है गर्चे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
(कुछ शब्दों के अर्थ भी लिख देने से शायद कुछ दोस्तों को ज़रा आसानी होगी नज़्म समझने में, सो ......)
दश्त-ए-तन्हाई = अकेलापन या एकांत का जंगल
लर्जां हैं = कांप / थरथरा रहे हैं, कम्पायमान
सराब = मरीचिका
ख़स-ओ-ख़ाक = गंदगी, धूल, कूड़ा
समन = चमेली का फूल
क़ुर्बत = सामीप्य
उफ़क़ = क्षितिज
गरचे = हालांकि
सुब्ह-ए-फ़िराक़ = विरह की सुबह
तो आइये सुनें, " दश्त-ए-तन्हाई में ........ "
| 07 Dashte Tanhai.m... |









2 comments:
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ
kya baat hai ....iss post ka javaab nahi MEET ..
बहुत बढिया. फ़ैज़ ने ही लिखा है
बोल के लब आज़ाद हैं तेरे
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