Monday, December 10, 2007

'मीत' अपने दिल को तन्हा, बेक़रार पाओगे - ग़ज़ल



मुद्दतों लाख बाग़--दिल में बहार लाओगे
तय है, उजाड़ कर ही तुम क़रार पाओगे

मंज़िल की ओर इश्क़ में हरगिज़ ना देखना
पास के दरमियाँ कोई गुबार पाओगे

राहत कि फिक़्र जिस घड़ी दिल से निकाल दी
उस पल से दोस्त, राहतें हज़ार पाओगे

कोशिश हज़ार कर चुको तामीर की जब तुम
तब देखना, उजड़ा हुआ दयार पाओगे

दिल को तेरे जब कि रहे मेरी ज़रूरत
दिल के क़रीब मुझ को बार बार पाओगे

मांगे से क्या किसी को कभी कुछ मिला भी है
गर पा भी गये, बे-सवाल प्यार पाओगे

जब सारा ज़माना तुम्हारा हमक़दम चले
'मीत' अपने दिल को तन्हा, बेक़रार पाओगे


दरमियाँ = बीच में, in between
गुबार = धूल
तामीर = निर्माण
दयार = इलाका, ज़मीन, भूभाग

8 comments:

नीरज गोस्वामी said...

"मंज़िल की ओर इश्क़ में हरगिज़ ना देखना
पास आ के दरमियाँ कोई गुबार पाओगे"
मीत भाई
क्या कहूँ इस बार आप की ग़ज़ल पे कुछ कहने को लफ्ज़ नहीं मिल रहे. भाई बहुत खूब लिखा है आपने. एक एक शेर मशाल्लाह इतना खूबसूरत है की बयां नहीं किया जा सकता सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है. इश्वर आप को ऐसे लिखने की तौफीक हमेशा अता करे. आमीन
नीरज

parul k said...

कोशिश हज़ार कर चुको तामीर की जब तुम
तब देखना, उजड़ा हुआ दयार पाओगे

bahut khuub meet ji....

Shiv Kumar Mishra said...

राहत कि फिक़्र जिस घड़ी दिल से निकाल दी
उस पल से दोस्त, राहतें हज़ार पाओगे

बहुत खूब, 'मीत' साहब....बहुत बढिया लगी आपकी गजल....बधाई स्वीकार करें.

Pratyaksha said...

जब सारा ज़माना तुम्हारा हमक़दम चले
'मीत' अपने दिल को तन्हा, बेक़रार पाओगे

सही क्या ?

बाल किशन said...

सुंदर और अच्छी गजल प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.

सजीव सारथी said...

मुद्दतों लाख बाग़-ए-दिल में बहार लाओगे
तय है, उजाड़ कर ही तुम क़रार पाओगे

waah janaab kya baat kahi hai aapne

Manish said...

बढ़िया लिखा है आपने..

Devi Nangrani said...

कोशिश हज़ार कर चुको तामीर की जब तुम
तब देखना, उजड़ा हुआ दयार पाओगे

seep se moti chunkar pesh kiye hai Meet ji aapne.

bahut khoob likha aur likhte rahiye.

Devi