Monday, November 9, 2009

"अवधूत : कबीर" : कुमार गन्धर्व









नहीं ..... कुछ कहना नहीं है.


अल सुबह से ये सुन रहा था ..... बार बार सुना ....... कई बार सुना !!


जी में आया कि इसे पोस्ट ही कर दूँ ..........


सुन कर देखें ...... शायद अच्छा लगे !!


जब बात "कबीर" की हो और अंदाज़ कुमार गन्धर्व का ......तो मुझ जैसे अदना इंसान के बस में कहने जैसा कुछ रह नहीं जाता .....






Saturday, November 7, 2009

मुझ निर्धन के धन बस तुम हो ! : "नीरज"








धनियों के तो धन हैं लाखों .....


आज बीस-एक दिनों के बाद वहाँ से लौट के आया हूँ, जहां खुदा न करे किसी को जाना पड़े ......... और अगर जाने की नौबत आ ही जाए तो वापस तो कभी न आना पड़े...........

मन में न जाने कितनी ही बातें हैं.......... मगर हमेशा की तरह खुद को कुछ भी कहने से असमर्थ पाता हूँ. और वो एक सवाल जो हमेशा की तरह मुझ पे सवार रहा : "किस से कहें ?"

बहरहाल, अपने मन की बात की कुछ कुछ छवियाँ गीतों के राजकुमार "नीरज" की इस गीत में अचानक दिखीं .... सो प्रस्तुत हैं ....

क्यों कि जिसे मेरा जूनून / पागलपन कभी पागल कर गया था .... आज उसे वही खुद पे भारी लगने लगे हैं. आज मुझे ये समझाया जाने लगा है कि पागलपन तो कोई भी कर सकता है ..... होश में रह के साथ रहें तो कोई बात हो !! जो मेरे साथ दुनिया की हर हद तक जाने को तैयार था ... आज उसे लोगों की इज्ज़त का पास प्यार से ज्यादा है...... शायद वोही सही हो ...... ग़लत शायद मैं ही हूँ ....... क्यों कि आखिर जिस प्यार पर दुनियाँ की मुहर न लगी हो ...... वो शायद पागलपन होती है या पाप .....



धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो !

NEERAJ - DhaniyoN ...






कोई पहने माणिक माल
कोई लाल जुडावे
कोई रचे महावर मेंहदी
मुतियन मांग भरावे

सोने वाले चांदी वाले
पानी वाले पत्थर वाले
तन के तो लाखों सिंगार हैं
मन के आभूषण बस तुम हो !

धनियों के तो धन हैं लाखों

मुझ निर्धन के धन बस तुम हो !


कोई जावे पुरी द्वारिका
कोई ध्यावे काशी
कोई तपे त्रिवेणी संगम
कोई मथुरा वासी

उत्तर दक्खिन, पूरब पच्छिम
भीतर बाहर, सब जग जाहर
संतों के सौ सौ तीरथ हैं
मेरे वृन्दावन बस तुम हो !

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो ! !


कोई करे गुमान रूप पर
कोई बल पर झूमे
मोई मारे डींग ज्ञान का
कोई धन पर घूमे

काया-माया, जोरू जाता
जस-अपजस, सुख-दुःख त्रिय तापा
जीता मरता जग सौ विधि से
मेरे जन्म-मरण बस तुम हो !


धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो ! !

Saturday, October 24, 2009

दो दिन के लिए मेहमान यहाँ .....








आज अजीब सा दिन है .....

एक बहुत बड़े अज़ाब से छूट गया हूँ .. या शायद एक जाविदाँ ग़म की गिरिफ़्त में आ गया हूँ .........

ऐसे हर मौक़े पे मुझे बस दो लोग याद आते हैं ......... मीर तकी 'मीर' और असदुल्लाह खाँ 'गालिब' ...


असदुल्लाह खाँ 'गालिब' ... ....के दो तीन शेर पढिये ........


घर में था क्या, कि तिरा ग़म उसे गारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरत-ए-तामीर, सो है


अब्र रोता है कि बज्म-ए-तरब आमादा करो
बर्क हंसती है, कि फुर्सत कोई दम है हम को


'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है, कि सब अच्छा जिसे कहें ?



और मेरी पसंद का ये गीत सुनिए ...........


खैर ये मेरी क्या ... आप सब की पसंद की आवाज़ में है ........


आवाज़ : लता
फ़िल्म : बादल
संगीत : शंकर जयकिशन


Wednesday, October 21, 2009

इधर उधर बिखर गया !!













न जाने कौन शख्स था
जो अधजगी सी आँखों में
धनक के तमाम रंगों के
सौ ख्वाब उधार दे गया


जो मेरे दोनों हाथों को
एक बार थाम कर
उम्र भर को
बंदी बना गया


ये उस के हाथों का लम्स
ये धनक के रंग
क्या थे ?
मेरे वुजूद में क्योंकर आये ??


कैसा फ़ुसूँ था
कि तारी हुआ
और मैं फ़रेब खा गया ?


वो शख्स जाने कहाँ गया


मैं इंतिहा-ए-उल्फ़त में
उस को ढूंढता हुआ
इस भरे जहान में


इधर उधर बिखर गया !!

Saturday, October 17, 2009

एक वो भी दिवाली थी .....








सभी दोस्तों को दीपावली की शुभकामनाएं.


ख़ुशी का पर्व है ..... किसी जाननेवाले का जन्मदिन भी है ...... लेकिन आज के दिन भी ये गीत पोस्ट कर रहा हूँ ........... ज़रूर कोई मजबूरी होगी.


बहरहाल, आप तो ये गीत सुनिए,


फ़िल्म : नज़राना (१९६१)
गायक : मुकेश
संगीत : रवि
बोल : राजेंद्र कृष्ण



एक वो भी दिवाली थी ......


Thursday, October 15, 2009

अहमद "फ़राज़"









यूनुस भाई की एक पोस्ट जब पढ़ी थी तब ये ग़ज़ल याद आयी थी ....

पढने की कोशिश की है ..... सुनना अच्छा लगे न लगे ....... ये ग़ज़ल ज़रूर पसंद आएगी .....






क्यों तबीयत कहीं ठहरती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं


हम हमेशा के सैर-ए-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं


शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं


शेर भी आयतों से क्या कम हैं
हम पे माना वही उतरती नहीं


उसकी रहमत का क्या हिसाब करें
बस हमीं से हिसाब करती नहीं


ये मुहब्बत है, सुन ज़माने सुन
इतनी आसानियों से मरती नहीं ]


जिस तरह तुम गुज़ारते हो 'फ़राज़'
ज़िन्दगी इस तरह गुज़रती नहीं



अहमद "फ़राज़"

Sunday, October 11, 2009

तू कि इक गम था अब तलक मुझ को
तू ने खुद ही बुझा दिया मुझ को
तेरी हर बात मुबारक हो तुझे
कहा कि इश्क ! और मिटा दिया मुझ को !!


तेरी दुनिया ... जिन दोस्तों के लिए जीती है
चलो मुबारक वो दो दोस्त आज से तुझ को
वो जो हर बात पे तुझ को कहें कि मेरे "अज़ीज़"
चलो अब उन ही दोस्तों के नाम रिश्ता है


चलो अब जो भी आये जी में वो ही करते हैं
चलो अब अपनी उम्मीदों से किनारा कर लें
चलो अब उन से कहो जैसे भी चाहें पुकारें तुम को
चलो अब आज मैं उम्मीद एक तोड़ता हूँ

Saturday, October 3, 2009

गुलशन की बहारों में .... : मुसर्रत नज़ीर









आज बहुत दिनों बाद ये गीत सुना .... इस आवाज़ को सुनें, शायद कुछ अलग सा लगे ............


आवाज़ : मुसर्रत नज़ीर
गीत : यूनुस हमदम









गुलशन की बहारों में रंगीन नज़ारों में
जब तुम मुझे ढूंढोगे आँखों में नमी होगी
महसूस तुम्हे हरदम फिर मेरी कमी होगी
गुलशन की बहारों में रंगीन नज़ारों में


आकाश पे जब तारे संगीत सुनायेंगे
बीते हुए लम्हों को आँखों में सजायेंगे
तन्हाई के शोलों से जब आग लगी होगी
महसूस तुम्हे हरदम फिर मेरी कमी होगी
गुलशन की बहारों में रंगीन नज़ारों में.


सावन की हवाओं का जब शोर सुनोगे तुम
बिखरे हुए माज़ी के औराक़ चुनोगे तुम,
माहौल के चेहरे पर जब धूल जमी होगी
महसूस तुम्हे हरदम फिर मेरी कमी होगी
गुलशन की बहारों में रंगीन नज़ारों में.


जब नाम मेरा लोगे तुम कांप रहे होगे
आंसू भरे दामन से मुंह ढांप रहे होगे
ग़मगीन घटाओं की जब छाँव घनी होगी
महसूस तुम्हे हरदम फिर मेरी कमी होगी
गुलशन की बहारों में रंगीन नज़ारों में.

Tuesday, September 29, 2009

तमन्ना, तू तो थी मासूम, तुझ से क्या गिला शिक़वा













न पूछो हिज्र ने क्या क्या हमें जलवे दिखाए हैं
इधर आँखों में अश्क़ आये उधर हम मुस्कुराए हैं


तमन्ना, तू तो थी मासूम, तुझ से क्या गिला शिक़वा
कि जो भी दिल पे टूटे, चर्ख़ ने वो ज़ुल्म ढाए हैं


अजब शय है मुहब्बत भी, सिखा जाती है क्या क्या कुछ
हंसी लब पर है और पलकों तले दरिया छुपाये हैं


शब-ए-हिज्राँ ये मत पूछो, कि क्या क्या दिल पे गुज़री है
कि लिख कर जाने कितने ख़त उन्हें ख़ुद ही जलाए हैं


किसी के दर पे सौ सौ बार यूं बैठे हैं जा जा कर
कोई देखे तो ये समझे, कि उस के ही बुलाए हैं


कोई उम्मीद अब ऐ आसमाँ तुझ से नहीं मुझ को
तेरी रहमत से आखिरकार अब हम बाज़ आये हैं


कभी इक बार तू भी 'मीत' ले ले इम्तिहाँ उस का
सुना है इश्क़ ने भी आसमाँ क्या क्या झुकाए हैं




चर्ख = चक्र, आसमान (आसमान वाले से मुद्द'आ है)

Monday, September 21, 2009

ईद मुबारक़ !








कोई भूमिका नहीं ... बस ईद के दिन एक खुशनुमा गीत ........ इस उम्मीद के साथ कि ईद हर किसी की ज़िन्दगी में खुशियाँ लाये !! इस ख़ुशी के दिन ये गाना सखी के नाम !!


मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का .... कैसी ख़ुशी ले के आया चाँद .. ईद का ....